मंगलवार, 27 सितंबर 2016

मुझको तो गाना है .

था एक अँधेरा कमरा 
कमरे में थी अलमारी .
अलमारी में रक्खे थे ,
कुछ डिब्बी-डिब्बे भारी .

डिब्बी डिब्बों के पीछे .
बैठा था आँखें मीचे .
एक काला वाला झींगुर,
सबकी नजरों से बचकर .
मन उसका था गाने का
जीभरकर झन्नाने का .

जैसे ही उसने गाया ,
चुहिया ने शोर मचाया
यह कौन बेसुरा गाता ?
कानों पर ही झन्नाता .”
चुप हो जा –चींटी बोली.”
करती छिपकली ठिठोली .
मकड़ी ने मारे ताने
यह जगह मिली है गाने ?”
बेवक्त लगे हो क्योंकर ,
मेरे भाई टन्नाने .

सुनकर खामोश हुआ वह
दो पल अफसोस हुआ यह
संगीत नही ये जानें
सुरताल नही पहचानें
पर सुझको तो गाना है .
मन सुर का दीवाना है .
यों झींगुर लगा सुनाने
अपने ही लिखें तराने.

सुनकर शन्नो घबराई
अम्मा अम्मा !”-चिल्लाई .
अम्मा की निंदिया टूटी
हाथों से पंखी छूटी .
वह झाड़ू लेकर आई
करती हूँ अभी सफाई
क्यों कहाँ छुपा झन्नाता
कानों पर ही टन्नाता .

देखा डिब्बों के पीछे
बैठा था आँखें मींचे
वो काला वाला झींगुर
सबकी नजरों से बचकर .
चिमटा से पकड़ा फेंका .
कूड़ेदानी में झौंका .
कैसे तो आजाते हैं .
कानों पर टन्नाते हैं .
यों अम्मा बोली कुढ़कर
कुछ कूड़ा डाला उसपर
ले और और ले गा ले.
बेसुरे और टन्नाले .

अम्मा फिर आकर सोगई
शन्नो सपनों में खोगई .
पर कूड़े में भी दबकर
गाता जाता था झींगुर .
हर हाल उसे गाना था .
वह सुर का दीवाना था .

1 टिप्पणी:

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